साथ ही।

खिलौनें पूछते नहीं
उम्र दुनिया की अब। 
खिलवाड़ हो रहा 
व्यस्कों के साथ भी।।

पर्दे ढकते नहीं ,
खिड़कियों को अब ।
काट रहे नाता 
गलियारे के साथ भी।। 

दीपक उजलाते नहीं,
मकानों को अब। 
झोपड गिर रहे 
बंगले के साथ ही ।।

अनाज भरता नहीं,
जठरों को अब ।
ज्वाला उठ रही
नीर न बहता साथ में।।

शीशे दिखाते नहीं,
चेहरे को अब। 
अंदर छिपा रहे 
हजारों चेहरे साथ में।। 

जीवन देता नहीं,
परिचय हमें अब ।
अकेले जीते रहना 
लोगों के साथ में।। 

~ चेतना 🌻

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