एक नई शुरुआत

देख लिया गौर से अपने शहर को भी। हां मैने भी आज साल के आख़री दिन बस मेरे शहर को देखना चाहा , ये जानने के लिए कल मेरे शहर के कितने रंग बदल जायेंगे। पर थोड़ी देर सोचने के बाद ये पता चला कि शायद उस सामने वाली इमारत में एक मंजिल और बढ़ जाएगी , और शायद सुन ने में आया कि terrace-garden भी बन जायेगा । पर मंजिल के बन जाने से भी तीसरी मंजिल पर रहने वाली बूढ़ी मां का बेटा फिर भी रहने नही आयेगा । या फिर बगल वाली उस छत पर प्यार की थोड़ी बौछार छा जायेगी पर क्या पता वो भैया फिर अकेले ही दाढ़ी बनाते नजर आए , उनके नसीब में विवाह है ही नही शायद। हस्ते हुए फिर में इधर देखा तो एक माता जी पापड़ सुखा रही थी , शायद इस साल उनकी बहू से उनका झगड़ा सुलझ जाए । लगता तो नही है कि सुलझ जायेगा पर सोचने में क्या ही जाता है । फिर बहू अपनी माता श्री से कुछ सीख कर आई है जो सास को थोड़ा रास नहीं आया। थोड़ा गली की तरफ आकर देखा तो , एक चाचा फिर से वही सियासी बातों पर चर्चा में व्यस्त थे , शायद 2024 में मोदीजी के आने पर सवाल कर रहे थे । पता नहीं , मगर बगल में बैठे बूढ़े अंकल फ्री की मूंगफलियों के सुट्ट...