साथ ही।
खिलौनें पूछते नहीं
उम्र दुनिया की अब।
खिलवाड़ हो रहा
व्यस्कों के साथ भी।।
पर्दे ढकते नहीं ,
खिड़कियों को अब ।
काट रहे नाता
गलियारे के साथ भी।।
दीपक उजलाते नहीं,
मकानों को अब।
झोपड गिर रहे
बंगले के साथ ही ।।
अनाज भरता नहीं,
जठरों को अब ।
ज्वाला उठ रही
नीर न बहता साथ में।।
शीशे दिखाते नहीं,
चेहरे को अब।
अंदर छिपा रहे
हजारों चेहरे साथ में।।
जीवन देता नहीं,
परिचय हमें अब ।
अकेले जीते रहना
लोगों के साथ में।।
~ चेतना 🌻
Very well written
ReplyDelete💛💛💛
ReplyDeleteAmazing work!
ReplyDelete🙂🙂🌚❤️ bahutt khubb likha hai aapne
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