ज़रा सुनो

ये खाली खाली रातें 
जैसे बेचैनी मांग रही हो ।
ये बेचैनी दिलो दिमाग की,
कहीं खालिपन ढूंढ रही हो।

ये सोती हुई दुनिया 
जैसे जिंदगी मांग रही हो।
ये जिंदगी इस दुनिया की ,
कहीं नींद ढूंढ़ रही हो। 

ये नायक की निगाहें 
जैसे मुहब्बत मांग रही हो ।
ये मुहब्बत जैसे नायकी की ,
कहीं निगाहें ढूंढ़ रही हो। 

ये तड़प विश्वास की 
जैसे वारि मांग रही हो।
ये वारि जैसे धोखे की ,
कहीं प्यास मांग रही हो।
   
ये सौगत खुशी की 
जैसे मसान मांग रही हो।
ये मसान जैसे मुर्दे की,
कहीं जान ढूंढ रही हो। 
                             ~चेतना 🌻

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