घर का भूला

अब अगर दिल्ली की सर्दी हो ,
कंबल में छुपी बैठी तेरी हमदर्दी हो ,
गिलासों में पिसलने को हमारी चाय तरसी हो ,
मानो खाली दिल के इश्क की भी आज बरसी हो।
ऐसे में कोई लिखना क्यूं ना चाहेगा?

शैतान के कारागार में ठहरने की तेरी अर्जी हो ,
बिन मौसम बरसने की तेरी मुझ पर मर्ज़ी हो ,
मेरी स्याही कही तुमको कलंक दिखती हो,
जैसे रद्दी में बिना भाव के ही शायद बिकती हो ।
ऐसे में कोई लिखना क्यूं ना चाहेगा?

अब सुनो जनाब,
मोहब्बतें सुफियानी सी अगर लगती हो ,
तुम्हारी कलम रिस रिस कर अगर लिखने को करती हो,
अगर खुद की दूरी में भी नजदीकी ढूंढना जरूरी हो ,
सीधी सी बात को शराब में डुबोना अगर मजबूरी हो ।
ऐसे में कोई लिखना क्यूं ना चाहेगा?
ऐसे में कोई लिखना क्यूं ना चाहेगा?                                                   
 - चेतना 🌻



So I wrote it back in December 2021 during winters.

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