दुनिया
एक दुनिया है
जो मैं देख नहीं पाती,
मैं गुजरती तो हूँ इसी से
फिर भी मुझे रोक नहीं पाती।
उसमें दो किरदार हैं,
एक मैं, दूसरा मुझे छोड़ कर सब,
मैं किसे देख पाती हूँ, पता नहीं
मुझे सब देखना भी चाहते हैं क्या, पता नहीं।
पता है, गाँव की कच्ची सड़क
मिलती है शहर की पक्की सड़क से,
उसे पार करने की ताकत बस कदमों में हैं?
पर मैंने देखा है नन्हें सपनों को दुनिया बदलते।
जब हम कुछ छोड़ कर आते हैं
ये सोच कर अब मुड़ना नहीं है,
पीछे खड़ा इंतजार करता इंसान
सोचता है चलो अब टूटना नहीं है।
पीछे खड़े इंसान की एक दुनिया है,
वहीं दुनिया जिसे मैं देख नहीं पाती
उसे मेरी पीठ देखती है, रोती भी है,
खैर पीठ का तो बोझ ही नज़र आता है।
पीछे रुक जाना शायद पीछे छूट जाना नहीं,
पर उसको रोका किसने?
या उसने मुझे जाने दिया?
या उसने समय को नाप लिया?
या मैंने उसके सबर को नकार दिया?
जो सबसे आगे बढ़ चुका है,
क्या उसका मुकाबला बस ईश्वर से है?
जो सबसे पीछे छूट गया है
कमाल है, उसे तो मृत्यु से भी डर नहीं!
कीड़े आखिर सबको खा जाते हैं,
उन्हें इस दुनिया का खौफ कहाँ,
वो सबको एक सा देखते हैं
सिर्फ मृत और निरर्थक।
~ चेतना🌻
Last part is Something like The Untold Truth ❤️
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