शीशा
आज शीशा टूट गया बेचारा
और वो टूट गया सारा का सारा,
मैं असल में तो बुजदिल ही ठहरा
पर वो कहता मुझे समंदर सा आवारा।
काश मिल जाता पहले कोई इशारा
कि कितने कपट से उसने मुझे निहारा,
छैल सा चेहरा और चमकते नयन लिए
मुखोटे में छिप कितनों का मैं बन बैठा हत्यारा।
अरे वो शीशे, क्या है किस्सा तुम्हारा
मेरा धुंधला सा होने लगा है नजारा,
कौन मेरा लेकिन कितना मैं किसका
कितना बेदर्द मैं, और किसका हूँ दुलारा।
चल उठ, जुड़ जा, झुठला दे दोबारा
मैं हूँ आने वाले कल का अनूठा सितारा
बाहरी शराफ़त की नोक पर रख मुझे
पर कर दे मेरा जीवन बेरूख और बंजारा।
~ चेतना 🌻
Nice written ❤️
ReplyDeleteDeep you think & deep you write to reach the hight💞
ReplyDeleteTruly Appreciable 👍🏻
Sitara For sure🩷
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