मर्जी है!

जा गिन आ लम्हें
तेरी तसल्ली के लिए
फिर मुकर जा 
तेरी ज़िद के लिए 
तू भूले तो भूल जा 
तेरी ही मर्ज़ी है 
मेरी बाहों पर रहम तो खा 
अगले महीने सर्दी है। 

ले मान लिया 
मैंने गुनाह किया 
तेरा सजदा और 
खुद को तबाह किया 
आज खोल ना दराज़ 
मेरी आखिरी अर्जी है
पढ़ उन पुराने खतों को
बोल दे इनकी श्याही फर्जी है। 

रेशम का रूमाल
उस पर कढ़े तेरे लब
लबों पर कायम शायरी 
उनके शुक्रिया करते शब्द 
मैं हाथ फेर उनपर सोचू 
क्या मेरा इश्क इनका चर्खी है 
तू नकार कर दफना दे भले
तेरे पीछे तो जमाने की गर्दी है। 

चेतना 🌻

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