विजय
चलो ये तो तय हुआ
जब खुद से परिचय हुआ
पहली खोज में तो प्रलय हुआ
ये प्रयास मेरा व्यर्थ विषय हुआ
दूजी खोज करने को मैं निर्भय हुआ
मेरी ऊर्जा का हल्का सा उदय हुआ
अगले कदम पर मेरा कठोर हृदय हुआ
इन कर्मों की सद् गति का क्या तात्पर्य हुआ
तीसरी बार खोज को आतुर मैं अवश्य हुआ
इस प्रकार न थक कर मैं जीवित मनुष्य हुआ
मेरे कदमों को फिर कभी न खुद पर संशय हुआ
अंतिम खोज तक पहुँच ये राही हमेशा विजय हुआ ।
~ चेतना🌻
Amazing truth hidden in words..
ReplyDeleteIm glad you read
Delete👏👌
ReplyDeleteThanks a lot
DeleteNice one
ReplyDeletequite inspiring💪🙃
ReplyDeleteYeaahhh bhoom
DeleteVery inspiring
ReplyDeleteI'm glad you read
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