सफर

किसी दिन बस्ता उठा
जिसमें सिर्फ किताबें 
और सुलझन समेट, 
घर को अलविदा बोल
मैं छोड़ दूंगा अफसोस 
मुड़ कर देखूँगा नहीं, 
गलियों के बीच से गुजर 
बाजारों में एक पल ठहर
माफ कर खुद को अब, 
शहर के अन्तिम छोर
पीठ पर भार और 
दिल में ठहराव लिए, 
मैं गया रेलवे स्टेशन
बैठ गया बैंच पर 
और जम गया दो पल, 
मेरे पास कोई टिकट नहीं
पर प्रमाण है मेरी जीत का
कि मैंने परिश्रम किया, 
मैं भले जीत ना पाया
मैं भले कायर कहलाया
सांस लेकर दिल सहलाया, 
पर ये मेरी हार होगी नहीं
क्योंकि मौत अभी दूर खडी़
समय भी पाबंद नहीं, 
इतना सोच मैं चुप हो गया
बगल में खाली सीट देख
बस इन्तज़ार करने लगा, 
मैं पकड़ लूंगा गलत ट्रेन
बिना उसका गंतव्य देखे 
बिना यात्रा का समय देखे, 
बचपना लेकर साथ ही
ढूँढुगा खिड़की वाली सीट
पर सामने वाली सीट खाली हो, 
एक गहरी स्वांस काफी होगी
इस मौके की हैरानी भुला
मुस्कुरा दूँगा आखिरी बार, 
ट्रेन की धीमी रफ्तार शुरू में
कर रही मेरी धड़कन तेज 
मैं भाग जाऊँ या लौट जाऊँ, 
अब बढ़ रही रफ्तार तेज 
शांत हो रहा मेरा दिल धीमे से
और निकल आया शहर से, 
खुलकर डरना होगा मुझे अब
खुलकर रोना भी होगा मुझे 
क्योंकि मैं हसना भूल गया था, 
मैं अकेला नहीं बैठा इस ट्रेन में
बैठे हैं वो लम्हें जो रोक रहे थे
मुझे आजाद होने से खुद से, 
डरो मत मैं मरने नहीं जा रहा 
न ही मुझे प्रियसी बुला रही 
न मुझे घर से अलगाव हुआ था, 
दरअसल मुझे छूनी है बहती हवा 
मुझे देखना मेरे साथ चलता सूरज 
चुभानी है तेज बरखा मेरे चेहरे पर,
संगीत गुनगुनाना है मुझे
वादियों को चींख भेंट करनी है
पर्वत को अश्रु समर्पित करने है, 
प्रश्न होगा उनसे मेरा फिर
बन तो गए ऊँचे तुम पर
क्या मिला इतना ठोस बनकर, 
रास्ते में आने वाले वो छोटे गाँव
जो बेहतर हैं मुझ से हर तरह से
कैसे सीख गए ठहरने का मज़ा, 
रास्ते में आने वाले वो बड़े शहर
जो बदल देते हैं धरती - संसार 
कैसे सीख गए सपनों की बेताबी, 
मैं गिनती करूँगा एक एक 
बेपरवाह गिरते झरनों की 
उन्हें देख अश्रु पूछ लूँगा खुद के 
नदियों नालों को स्थायी न देख
स्वाभिमान होगा खुद पर और 
मैं एक बार मुस्करा दूँगा, 
मैं बहुत दूर आ चुका हूँ अब
खुद से, शहर से, दर्द से, 
मज़ाक से, बोझ से, फर्ज़ से, 
मैं पास में बैठा हूँ अब 
हिम्मत के, डर के, समय के, 
जिंदगी के और धड़कन के, 
यार एक बार रोना पडे़गा 
इस पहली यात्रा के लिए 
जो भटका रही मुझे असल में, 
इतना जोर से कि याद आ जाए
पहले प्रेम का अधूरा वादा और 
आखिरी प्रेम का पूरा समर्पण, 
इतना शोर कि जो मुझ तक हो
जो बस मुझ से ही हो बहुत तेज़
मेरी साँसों से भी बहुत तेज़, 
पता है मैंने सरहद पार कर ली
सब बदल गया, देश, शहर, 
वहाँ की भाषा, वहाँ का रंग, 
वहाँ का विद्रोह, वहाँ का हूनर, 
पर ये न प्रारंभ है न ही अंत 
मैंने यात्रा को चुन लिया है 
मैंने खुद को चुन लिया है।। 
~ चेतना 🌻

Comments

  1. Ab khudko chun hi liya hai to intezaar rhega us pal ka jab tum vo haasil kr loge jo krna chahte ho, pana chahte ho kyuki acceptance is the thing that log easily nahi kr pate and u r challenging tht acceptance tooo i m waiting for it 🙂🧒

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  2. Middle part was fire.......keep writing 🤞

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