चार दिवारी

आज अखबार में खबर छपी
शहर में हुस्न की बोली लगी, 
आँखों की सादगी दिखी नहीं
नजाकत में इस पल बदल चुकी, 
सजने पर वो प्यारी गुड़िया लगी
कोठों में मोहरों का जरिया बनी, 
कौन गिनेगा चोट कितनी लगी
किसे दिखेगा मर्जी किसकी चली, 
सवाल पूछा तो गुसताख बनी 
उसकी किताबें सूली पर चढ़ी, 
हर रात हर बार नयी मौत मिली
किरणें किस्मत से मिटने लगी, 
कली अब दुनिया में जलने लगी 
गुल की मुसकान से वो डरने लगी, 
ढ़लती शाम एक साधना बन गई
दाम की गिनती रोजगार बन गई, 
चमकते कमरों में बेरंग ज़िंदगी मिली
जख्म खाकर ईनाम जैसी तारीफ मिली, 
लिखी जाए जो अगर ये कहानी कभी
उसकी कहानी में होगी हर कहानी नई, 
पूछेगी वो बेवजह क्यों वो दफन हुई
जो बेचने आया उसके वो पेट पड़ गई, 
अरे उसे भी तो प्यार की ललक होगी  
उसे भी श्रृंगार से सुंदरता मिलती होगी, 
चाहत नहीं उसे चोर बाज़ारी मिली 
आसमान के लालच में चार दिवारी मिली। 

~ चेतना 🌻

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