कलंक

खैर एक किस्सा काफी नहीं
मुझ में मुझ सा कुछ बाकी नहीं
नयन ढूँढें खुद ही में दोष मेरे
परंतु मिलती कहीं माफ़ी नहीं।


मैंने कई भाषाओं में प्रेम करा है, 
मैंने कई भाषाओं से मौन रचा है, 
कई भाषाओं के मोह में फँस कर 
बस एक भाषा से मेरा हृदय जला है। 


किस्तों में बिक गया मेरा अभिमान, 
मेरी मिट्टी से बना ढह गया मेरा मकान, 
दुनिया की आँखें नोचकर पूछूँ मैं
किन लाशों ने सजा दिया ये कब्रिस्तान। 


कितना सरल वो संवाद हो, 
दो मुसाफिरों में जी भर बात हो, 
शब्दोंं में करुणा और मन में इच्छा 
दोनों जान गए आगे ना ये मुलाकात हो। 


जिसे दीपक सौंपा, वही नरक बना रहा, 
जिसे सत्य कहा , वही अब भेद बता रहा। 
इस बार रंगों से नाता नहीं कोई मेरा
जिसे आसमां सजाने बोला, कलंक बना रहा। 

~चेतना 🌻

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