मातम

दुनिया की खासियत है, 
कि अलग है हम सब 
बनावट, सजावट और 
चेहरों की लिखावट में। 
परंतु
दुनिया की मासूमियत है, 
कि एक जैसे है हम सब 
एक ही दिखावट और
एक ही पागलपन और 
साफ छलकता खालीपन।। 


शुरू में सबको लगता है, 
मेरी कहानी अलग होगी
उस पहाड़ पर एक घर
और उसमें बसी तरंग होगी। 
पर
मेरी मंज़िल को बेवक़्त
खुद ही से चुभन होगी, 
मेरे आस पास घर परिवार
और चारों ओर लपट होगी।। 


कितना यकीन होता है हमें
लकीरों में कि बिना संकोच
खींच देते हैं, और बाँट देते हैं 
वतनों को, रिश्तों को, विकल्पों को। 
पर
टुकड़ों के हाथ तन्हाई आई है
टूटे वतनों के हाथ तबाही आई है, 
बिछड़े घरों के आंगन के हाथ
जंजीर से बनी खाली चारपाई आई है।। 


संसार वादों से आगे चलता है
और नियमों से वहीं बंध जाता है, 
दोनों में हमारा उतना ही हाथ है 
जितना कर्ज का आमदनी में है। 
लेकिन
हम उलझ गए प्रमाण देने में
हम थक गए प्रयास करने में, 
हम चलते गए प्रीत को हराने में
हम ढलते गए प्रिय को बहलाने में।। 


मधुशाला में बिकती है जवानी
बदले में मिलता है समग्र सम्मान, 
उनके हाथों जो बेच चुके हैं ईमान
और ठुकरा चुके हैं खुद की पहचान। 
फिर 
तुल जायेगा, बिक जायेगा 
छुट जायेगा, छिन जायेगा, 
हर भाँति का अघोर अभिमान, 
जिंदगी का मातम और शमशान।। 

~चेतना 🌻

Comments

  1. Aacha blog toh nhi hai par meri behen hai toh aacha bolna pad raha hai

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