कहीं प्रेम न हो जाए!
कहीं अंबर की चाह में
इमारतें गिर ढेर न हो जाए,
मेरे कारीगर के हाथों ही
मेरे संचय में देर न हो जाए।।
कहीं गहरा हो घाव मेरा
उसके प्रेम की मेहर न हो जाए,
मरहम लगा मुझे बार बार
उसका जीवन ज़हर न हो जाए।।
कहीं नदियों का बहाव
उसकी आँखों में तेज न हो जाए,
मेरे दर्दों का मोल उठाना
हर रोज का खेल न हो जाए।।
कहीं रंगों भरी दुनिया
उसकी अंत में श्वेत न हो जाए,
मेरे मौन से थक इस बार
उसका हृदय प्रेत न हो जाए।।
कहीं मेरी अग्नि से जुलस
उसकी करुणा राख न हो जाए,
मेरी आज की नादानी
कल बिगड़ी बात न हो जाए।।
उसे मुझ से प्रेम न हो जाए,
और मेरी मौत का कारण
उसके सिर न हो जाए।।
~चेतना 🌻
🤍
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