आज़ादी

आँखों की आज़ादी छिन गई, 
जो स्वप्नों में जकड़ी गई थी कभी
जो ज्वाला से भरी पड़ी थी कभी
जो अश्रु रोक कर खड़ी थी कभी। 

किताबों की आज़ादी छिन गई, 
जो खून से लिखी गई थी कभी
जो भूल कर पढ़ी गई थी कभी
जो सत्य की पूर्ण छवि थी कभी। 

उम्रों की आज़ादी छिन गई, 
जो युगों से बीती नहीं थी कभी
जो खेलों में उलझ रही थी कभी 
जो समय के बीच रुकी पड़ी थी कभी। 

तस्वीरों की आज़ादी छिन गई, 
जो यादों के व्यापार में बिकी थी कभी
जो कैद होकर भी ज़िंदा बची थी कभी
जो सामने आकर घर मे छिपी थी कभी। 

बातों की आज़ादी छिन गई, 
जो मुझे संसार से कहनी थी कभी
जो शायद प्रेम में बहनी थी कभी
जो मेरे हृदय के पार थमनी थी कभी। 

किरणों की आज़ादी छिन गई, 
जो अंधकार से लड़ मिटी थी कभी 
जो पूनम की होड़ में लगी थी कभी 
जो टुकड़ो में बट जुड़ी हुई थी कभी। 

अरे आज़ादी छिन गई, 
जो मिली वो भी मिट गई 
जो मिटी फिर होड़ लग गई
अरे फिर आज़ादी छिन गई।। 

~चेतना 🌻

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

noblewomen

what could be certain or permanent?

panacea