चित्रकार?
मिले एक ही जवाब
जिसके प्रश्न हज़ार।
मैं पाषाण, तुम पाषाण
टकराएं तो मचे हाहाकार।।
खाली रण में चला
नायक उठा तलवार।
आस में मलीन नायिका
दर्पण से रुष्ट हुआ श्रृंगार ।।
कड़वे स्वर में गीतों का
कोयल सुना देती पूरा सार।
देह में सुध बुध खोकर
प्रेम को कोसों दूर छोड़ आया संसार।।
धरती की जंग का
बैठे स्वर्ग में दरबार।
देवों के महलों में,
असुरों का शाही घर-बार।।
शासन की होड़ में
हो रहा अधिकार पर प्रहार।
सत्ता की भूख से तड़प
रोटी छीन हो रहा परोपकार।।
मिलो अगर तुम मुझ से
ढूंढ लोगे नफ़रत के कई प्रकार।
दोष न तुम्हारा न मेरा,
वर्षों से लापता है वो चित्रकार।।
~चेतना 🌻
🤍
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