खूबसूरती
मानव इतिहास में सबसे ज्यादा चर्चित और सबसे ज्यादा विद्रोह में रहने वाला किस्सा है खूबसूरती। जिसका विचार, विमर्श,अध्ययन, विकास और निष्कर्ष हमेशा बाहर ढूंढ़े गए हैं। और मैंने भी मूर्खतापूर्ण पूरे आठ-नौ महीनों तक परतंत्र करे रखा इस लेख को कि मुझे भी कहीं निष्कर्ष मिल जाए। कमाल तो तब हुआ जब मैंने हार मान ली, और परतंत्रता की बेड़ियां पहना दी मेरे काव्यात्मक व्यक्तित्व को।
खूबसूरती के एक हिस्से को दाग लग गया, खैर दाग भी खूबसूरत होते हैं परंतु अपने द्वारा हासिल कर गई स्वतंत्रता का विनाश कर देना खौफनाक है।
हिम्मत खूबसूरती है, हिम्मत देकर दिल जिताने वाला भी। इन शब्दों ने पहचान दी है, और लेख को पूरा करने में पूरा साथ भी। ग्रीष्म से शरद तक मेरी उम्मीद को खुले दिल से धन्यवाद और माफी भी। जो मैंने कह नहीं सकती, वो मैं लिख देती हूं। और इस लेखन क्रिया को जागृत करने में मेरी उम्मीद को फिर से आभार। लेखकों को बुरी आदत होती है - जिनसे उनको लगाव होता है, वो उनके विषय बन जाते हैं और सारा संसार देख पाता है उनको नमन करते हुए , उन्हें शब्दों से धन्यवाद करते हुए। प्रेम के लिए प्रेम से अभिवादन करते हुए।
मेरे लिए ये लेख नहीं, एक खत है।
खत और भी खूबसूरती से पढ़े जाते हैं।
वर्ष बीत जाते हैं, किंतु खूबसूरत ही नज़र आते हैं।
और मैंने तो फिर भी खूबसूरती पर लिखा है,
सोचो कितना खूबसूरत होगा।
परन्तु वह ये नहीं भूलती उसके ढल जाने के बाद कुछ खूबसूरत नहीं बचेगा जिसको दुनिया खूबसूरत कहकर मन बहलाएगी।
अंधेरा भले कितना ही खूबसूरत हो , रोशनी के आगे बेबस हो जाता है , और रोशनी भले कितनी ही धुंधली हो , अंधेरा तो नहीं ही कहलाती।
आजकल अंधेरे को एक अलग प्रकार का प्रोत्साहन मिलने लगा है और सुन में बार बार आता है कि जो अंधेरे को ललकार सह जाता है,वो कमजोर नहीं कहलाता! परंतु रुको, कमजोर कौन नहीं - जो बस सह जाता है, वो नहीं जो लड़ना चाहता है । हां, जो लड़ना नहीं चाहता, वो सहना चाहता है। तभी वो अंधेरे को गले लगाता है।
अक्सर अंधेरे को प्रेम वही कर पाता है जो उजाले से डर जाता है और उसमें अरुचि दिखाता है।
उजाले को अंधेरा ढक नहीं पाया और अंधेरा उजाले को काट नहीं पाया। दोनों का ये अंदाज खूबसूरत है।
खूबसूरती की तलाश में हर भोर, हर दोपहर, हर शाम, हर रात ~ हर दिन बस यूंही निकल जाते हैं और न कोई विजयी रह पाता है और न किसी को हार का सबक मिल पाता है।
मैंने कहीं पढ़ा था , "हर इंसान के अंदर एक गांव होता है, जो कभी शहर नहीं हो पाता है!"
और हर शहर में रह रहे गांव के लोग बेताबी महसूस करते हैं, क्युकी आखिर उस घुटन के बिना ताज़गी की मिठास सुहावनी कैसे ही नज़र आएगी ! और कमाल की बात तो ये है इस बेताबी में अलग पहचान होती है प्रेम की।
ठीक उसी तरह जैसे एक चिड़िया जिसे कैद से प्रेम करने को मजबूर कर दिया हो, और एक आजाद दिन की कल्पना उसके मस्तिष्क में चित्रित करके रखी हो ।
कैद में आराम होता है, राहत होती है, चैन होता है, सुकून होता है, सुख होता है। अरे, कैद तो वो उपवन है ,उन सुगंधित पुष्पों का, जिनको आपको पानी देना होगा हर बार, और आपको ही क्यों ?
क्योंकि उनको कुदरत ने नहीं बनाया है, उसे कैद थोड़ी पसंद है, वो उनका ख्याल रखने में हमेशा विरोध करेगी। उस कैद की इच्छा तुम्हारी ही थी, तो उपवन की जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही होगी ना। उस कैद की जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही होगी। और तुम्हारी जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही होगी।
अगर कैद में ही आपको खूबसूरती नज़र आ रही है तो आपका जीवन संघर्षशील तो नहीं कहूंगी परंतु सिर्फ काल्पनिक है जो आपके हाथ में नहीं, किसी ओर के में है। जीवन तो छोड़िए, कल्पना भी आपके हाथ में नहीं है। किंतु उसे खुद के और समीप लाने में इच्छा और शक्ति आपकी ही है।
खूबसूरती शक्ति से आती है, शक्ति में मिलती है और शक्ति में रह जाती है। ये शक्ति आपकी कैद में नहीं, आपकी खूबसूरती में है जो एक दिन स्वतंत्रता को प्राप्त कर और अधिक खूबसूरत हो जाएगी। खुद को वचन दिजिए।
प्रेम क्षितिज समान है,
जहां आसमां धरा का भी मिलन हो जाता है।
~चेतना
कभी ऐसा महसूस तो नहीं हुआ था क्युकी मेरा संसार हमेशा से ही आसमां से शुरू हुआ था और आसमां में ही वर्जित। और वहा मैंने धरा को लेकर कुछ धारनायें बनाये रखी थी ।
किसी ने मुझ से पूछा एक बार, क्या तुम्हे कभी प्रेम की अनुभूति हुई है? मेरे पास उसका उत्तर नही था, क्युकी मुझे मिलन का भय सताता है। ऐसा मिलन होगा भले ही खूबसूरत परंतु एक सा कहा ही रह पाता होगा उनके लिए जो मिलन का अनुभव करते हैं।
मेरे दिमाग जैसे दिल ने सोचा जिस दिन मुझे लगे मुझे आसमां की सीमाएं तोड़ कर धरा पर बने उसके घर की तड़प महसूस होगी, और फिर भले उसका घर पिंजरा ही क्यू न हो।
उस घर को मेरा घर बना, उसको पंख देकर उसका आसमां में उड़ जाना, उसका मन हो तो लौट कर आना, और न भी आये तो उसकी आज़ादी को जीत समझ जश्न मनाना और मेरे पिंजरे को उसका दिया हुआ सबसे प्यारा उपहार समझ हर पल उसको सजाते रहना।
और शायद फिर प्रेम की अनुभूति ही हो जाए।
लिखने को ये बहुत सरल है, उस से भी ज्यादा पढ़ने में, और उस से भी ज्यादा इसी खूबसूरती को हर लेख और कविता में पेश कर देने में।
ताकत के खो जाने का डर सिर्फ उसको नज़र आता है जिसको समय कमजोर बनाता है ।
जिसे समय से ही समय नहीं मिल पाता है या यू कहो कि वो समय को नहीं समझ पाता है , उसको ताकत के खत्म होने तक भी अफसोस नज़र नही आता है।
समय तय है, परंतु वो भी मौत के बाद! क्योंकि वो ठहरा हुआ नजर आएगा। समय प्रवाह है, क्योंकि अगर ठहरा हुआ भी है, तो भी इतनी ताकत रखता है फिर से तुम्हें अहसास कराने का कि वह निरंतर है। दुनिया के कण रूपी जीवन-मरण की क्रिया से तो बहुत उपर है। तो फिर हमारे लाभ-हानि जिनसे हमारा जीवन टकराता है, समय के कहे अनुसार हमारी स्थिति दर्शाता है।
कमजोर पड़ जाने पर समय का दोष खत्म ही नहीं हो पाता है , और समय यदि मनुष्य में ताकत झोंक दे तो फिर समय का प्रभाव शून्य समान रह जाता है ।
बचता है फिर से गुरूर - खूबसूरती का , जिसको दुनिया खुबसूरत कह कर मन बहलाएगी।
क्योंकि जब तक समय है , वो खुबसूरत है , आप खुबसूरत है। और यदि वो नहीं, सब शून्य है।
समय विवश है, सामर्थ्य से। समय भयभीत है, संघर्ष से। समय लाचार है, समाधान से। किंतु प्रश्न तो आपके समय से हुआ है ना? क्या आपका समय आपने ईमानदारी से निभाया है, या नाममात्र भी इच्छा रखते हैं निभाने की? शायद समय थोड़ा झुक कर आपका स्वागत करें। और खूबसूरती को परिभाषित करे आप ही की छवि में उतार कर।
संगीत, नृत्य, कविताएं, खेल, चित्रकारी, पुस्तकें, काशिदकारी, नक्काशी, आदि-- किंतु आदि लगाकर मैंने एक प्रश्न पूछ डाला। आपने पूछा क्या खुद से ? कि आपके अंदर कौनसी कला या फिर कलाएं हैं? खैर हमें इस उच्चतम अभिज्ञान की खूबसूरती कभी नहीं समझाई गई जो कि हमसे हमेशा से जुड़ी है ।
सबसे आसान है - कला का उपहास बनाना। उस से थोड़ा कठिन कला की प्रशंसा करना। उस से थोड़ा और कठिन प्रश्न पूछना दूसरों की कला के बारे में। और उस से थोड़ा और आगे कठिन आ जाता है उस दूसरे के सवाल को खुद के अहंकार से दूर रख कर गमन करना ।
परंतु सबसे ज्यादा कठिन तो मुस्कुरा देना है और खुद को उतना ही खूबसूरत समझना जितना एक कलाकार होता है। केवल एक स्वीकारात्मक मुस्कुराहट ही अहंकार को मार सकती है और आपको एक कलाकार बनाता है, अन्यथा साधारण व्यक्ति और कलाकार में क्या भेद रह पाएगा।
मुझे एक क्षण भी नहीं लगा खुद को, आपको, और सबको कलाकार बनाने में। हां पर मुस्कुराहट की छोटी सी शर्त के साथ । क्या कला का अंदेशा सिर्फ दुख के बाद होता है? दुख जो कोई और देकर जाता है! कहते हैं दुख के बिना कलाकार बेरोजगार हो जाते हैं, दुख से निकली हुई कला इतिहास बनाती हैं। मुझे दुख के आने या जाने से कोई शिकायत नहीं है, मुझे तो बस उत्तर चाहिए - आपकी कला का।
यदि आप करूणानिधि, दयावान, शांतिपूर्ण और निष्पक्ष व्यक्तित्व से अपने अंदर सिमटी हुई कला को हर हाल में आजाद कर देना चाहते हैं तो आपका उत्तर आप खुद हो। उस कला को बाहर निकलने के लिए किसी एक दिन बहुत करीब व्यक्ति से हृदय घात के इंतजार की आवश्यकता नहीं है, अपितु अब तक हुए सब पापों को मुस्कुरा कर क्षमा कर देने में है।
माफ़ कीजिए परंतु आपको स्वीकार करना होगा आप एक कलाकार है । और जहां संतुष्टि है, वही खूबसूरती है। संतुष्टि सफलता का हिस्सा होगी परंतु प्रयत्न की शत्रु है । प्रयत्न तो खूबसूरती से भी ऊपर है, अनादि तक।।
धन्यवाद।
~ चेतना 🌻
💛💛💛
ReplyDelete❤❤
DeletePleasure read...keep the passion going
ReplyDeleteThank you so much
DeleteNice 🎊👍🌹
ReplyDeleteThank you so much
DeleteWonderful 👍🏻😊
ReplyDeleteI'm glad
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