मैं और वो

मेरे शहर के मकान अब,
थम गए उसकी ज़मीन के लिए ।
उसके गांव का घर हो गया मेरा,
हमारी नई अटारी के लिए।।

उसकी आंखों के पार रखा क्या,
जो शुक्र हो मेरे जीवन के लिए।
एक बना दिया उसने हम दोनों को,
साथ ही डूबेंगे हमारी मौत के लिए।। 

उसके दूसरे कप को होश आया,
साथ में चाय पीने के लिए।
मेरे शरीर ने नया रोग लगाया,
चाय में फालतू चीनी के लिए।। 

मेरे गीतों को भा गए स्वर नए ,
उसके पुराने संगीत के लिए।
उसके इतर जाते है ईश्वर भी,
हमारी विशेष बरसात के लिए।।

उसे नदी की तलाश थी,
उसके समंदर के लिए।
मुझे बह कर मिलना था,
हमारे संगम के लिए।।

~ चेतना 🌻

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