एक किताब
मुझे एक किताब तो लिखनी है तुम पर,
क्यूँकि कही जिक्र ही नहीं है तुम्हारा मेरी कहानी में।
देखना है मुझे अगर ये एक किरदार मेरी कहानी में होता, तो मेरी कहानी का ढंग क्या होता ।।
मुझे एक किताब तो लिखनी है तुम पर ।।
वास्तविक तो होगी नहीं, पर काल्पनिक भी नहीं।
जुनून जो कभी था ही नहीं,
लहू कभी सासों से गुजरा ही नहीं,
देखना है मुझे अगर ये एक किरदार मेरी कहानी में होता, तो मेरी कहानी का ढंग क्या होता ।।
मुझे एक किताब तो लिखनी है तुम पर ।।
चलती हवा जो कभी मुड़ी ही नहीं,
कदर जो मेरे सिवा किसी की करी ही नहीं।
शाम जो सफेद को छोड़ रंगीन हुई ही नहीं,
कोशिश जो मुझे खोने की रही ही नहीं ।
देखना है मुझे अगर ये एक किरदार मेरी कहानी में होता, तो मेरी कहानी का ढंग क्या होता ।।
मुझे एक किताब तो लिखनी है तुम पर ।।
इश्क़-ए-डोर जो उंगलियों में थमी नहीं,
काबिल किसी की खोज में मैं रही नहीं,
दुआ किसी के लिए मेरी नमाज में साथ बही ही नहीं,
मैं थी वहाँ और शायद उस किरदार में मैं थी ही नहीं । देखना है मुझे अगर ये एक किरदार मेरी कहानी में होता,
तो मेरी कहानी का ढंग क्या होता ।।
मुझे एक किताब तो लिखनी है तुम पर ।।
-चेतना 🌻
🫶🏻
ReplyDeleteBeautiful ❤️
ReplyDelete👍👍👍👍
ReplyDelete🐢🧡❤️
ReplyDelete