टुकड़े बोलते हैं!

किन्हीं दूर गहराइयों में
शायद भू के भी पार दफ़न
किसी कल्पित स्रोत में
छिपा हो तुम्हारा आक्रोश
जो नजर में ना हो
तुम्हारे वर्तमान, भविष्य की

शायद धमक किसी दिन 
परिस्थिति वश जो रोक
न पाए अंदर की आग 
उफन जाए और फिर 
अंदर लौट न पाए पर
भू से निकल हाहाकार मचाए

निश्छल भले दोष हो तुम्हारा 
उफन जाए सार्थक अवशेष 
साथ में संसार के लिए
मगर काट न पाए जग
के तप को फिर अपना 
ताप विकिरण कर जाए

भूल कर ज्वाला एक ही 
स्थान पर ठहर जाए और
अपना कुटुंब आस पास
बसाए जैसे भूल गए फिर 
से अपनी ज्वाला की क्षमता
सब जैसी मुझ में करुणा

सदियों तक होगा दिखावा
तुम्हारे रूपांतरण का जिसका 
भोग भरा सबने तुम्हें छोड़कर
अश्रु आपदा प्रवाह कर
विलुप्त भी कर दी तुमने 
समय आया अब बह जाने का

कमाल होगा जब अपने शुरू 
करेंगे तुम्हारी बर्बादी और
तुम्हें बिखर जाने में मिल
जाएगा तुम्हारा उद्देश्य
ठोस जिसे जीना था कभी
टूटने को जी भर चाहेगा

समय घुमा कर देखा मैंने
तो पाया टुकड़े बोलते हैं 
बोली आक्रोष की 
बोली हाहाकार की
बोली अवशेष की
बोली कुटुंब की 
बोली रूपांतरण की 
बोली बिखराव की 

और ज़मीन पर गिरे हुए 
चीखते है स्वयं की रफ्तार की 
गहराइयों से ऊंचाइयों को जाने की
ऊंचाइयों से भूतल पर टिक जाने की 
भूताल पर पैरों के बीच में आने की 
और फिर हमेशा माटी बन जाने की

टुकड़े बोलते हैं।

~चेतना 🌻






Comments

  1. आसमां और जमीं के सिरे जब क्षितिज मे सूरज की किरणे बोलती हैं
    समाज में एक नयी चेतना को जगाने तब आपकी वाणी बोलती है।

    ReplyDelete
  2. Nice keep going on!👍😊

    ReplyDelete
  3. क्या लिखू तेरी तारीफ में यार
    अल्फ़ाज़ कम पड़ रहे हैं शायद

    ReplyDelete
  4. Very well written Chetna....keep writing 🤍

    ReplyDelete
  5. Chetna you doing great, keep it up!

    ReplyDelete
  6. Chetna you doing great, keep it up!

    ReplyDelete
  7. After reading your poem I believe tukade bolte hai...God bless you

    ReplyDelete
  8. Wow👍🏻🔥

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

who wrote you?

विजय

कहानियाँ