मैं लिखना छोड़ दू क्या?

नज़्म से खून बहने लगा है ,
कर्म से धर्म कहने लगा है।
सत्य को जीतने असत्य घर से निकल पड़ा है,
अधर्म को हराने बलिदान कब्र से बिछड़ गया है।
मासूम को कटघरे में देख, मैं न्याय को तोड़ दू क्या ?
दर्द नियारे मिलेंगे रोज, तो मैं लिखना छोड़ दू क्या?


स्वाद अनुसार नमक भी हराम लगने लगा है,
कमाई का जोर कम, कर ज्यादा ठगने लगा है।
नवयुग के उत्थान में तत्काल विनाश में खड़ा है,
मेरा ईश्वर, तेरा ईश्वर, पर सबका ईश्वर मिट गया है।
नज़र को बिकता देख , मैं नजरिया को छोड़ दू क्या?
दर्द नियारे मिलेंगे रोज, तो मैं लिखना छोड़ दू क्या?

~चेतना 🌻

Comments

  1. बिल्कुल नही चेतना।

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  2. 🤟🤟👏👏❤️❤️

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  3. Wow. Proud of you.
    Priti

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  4. अद्भुत 🙏🙏🙏

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  5. I must say you're a gifted writer. Keep writing awesome stuff like this, Chetna ✨✨

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  6. Its very nice. Great work and thinking

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  7. Aree bht sahi... This line"Najar ko bikhta dekh mai......." 👌👌👌

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  8. तुम कवि नहीं पर कविता लिखती हो ,
    तुम ऐसी नहीं हो जो शब्दों में दिखती हो ,
    बस वही लिखती हो जो एक रंग में कैद न होकर महसूस करती हो l

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