मौत
अपनी रोज की ज़िंदगी के कार्यों ने मेरे 17 वर्ष के समय में मुझे कभी एक चीज की याद नहीं आई।
क्यूंकि या तो वो मुझे खुद से ज्यादा दूर लगती थी या फिर आज पास भी होती तो मेरे साथ क्या ही बुरा करेगी।
वो भयावह रात 19 दिसम्बर की है , और घंटों , मिनटों, सेकंडो , मै कुछ नही भूल सकती हूं।
क्यूंकि उस रात के बाद मुझे वो सबक मिला जो मैं कभी सीखना ही नहीं चाहती थी !
19 की रात 8 बजे पिज़्ज़ा नामक एक भोजन जो मुझे कतई पसंद नहीं, अपने भाई बहनों की जिद के कारण मुझे मंगवाने पड़े और खाने भी पड़े। चलो ये भी ठीक है। 10 बजे मेरी बहन ने कहा कि आज फिल्म देखेंगे रात में , मैंने हामी भरदी , हालांकी वो भी मेरे नापसंद कामों में से एक है।
परन्त , जीतू भैया और स्वेता तिवारी की गोनेकेश मुझे बेहद पसंद आई। M लघभग 12:15 पर सो चुकी थी ।
उस रात नींद को भी बहुत गहरी आना था शायद।
सुबह 6 बजे मेरा भाई मुझे तेज से चिल्ला कर जगता है कि बावजी की तबियत खराब हो रही है , गांव जाना पड़ेगा।
तबियत ख़राब ?
नींद के कारण मुझे आधे शब्द ही समझ आए । परन्तु मैं कुछ सेकेंड में ही उठ गई।
20 दिसम्बर से 2 हफ्ते पहले उनको अस्पताल लेकर जाना था , पर खेरकी दौला से आगे किसान भाईयों ने कृषि कानूनों के खिलाफ मोर्चा निकला हुआ था । तो वह रद्द करना पड़ा।
परन्तु ये हादसा भी शायद इस सबक का हिस्सा है कही। ना कही । क्यूंकि अगर मोर्चा ना होता , तो वो 2 हफ्ते पहले अस्पताल में होते , हन्ना।
उठने के थोड़ी देर बाद चाचा जी ने कहा कि बच्चों के कुछ कपड़े पैक कर लो, क्या पता कितना समय लग जाए , मेरा जी एक जगह नहीं टिक पा रहा। और उस समय मेरे परिवार में भी किसी का नहीं।
हम घर की ओर रवाना हुए, गाड़ी में बिलकुल शांति थी , शाइद सबको एक आस थी । हमको देखना चाह रहे होंगे क्यूंकि 15 दिन पहले की तो घर से लौटे थे पूरे 20 दिन रुकने और भाई को ब्याहने के बाद।
हरियाणा में कदम रखते ही चाचा जी ने कुछ शब्द बोले,
जो आज भी कानों में दौड़ते हैं जैसे जान बूझकर चाहते हैं , तुम सुनो , तुम सुनो ,और सुनकर रो दो , पर तुम सुनो।
किसी व्यापारी से बात करते बोला कि डील में कुछ 15 दिन का समय लग सकता है , परन्तु आप परेशान न हो।
15 दिन !
सुन ने में जी सा घबरा जाए एक कठोर से कठोर इंसान का , जिनमे मैं भी एक हूं , और शायद बचपन से।
"बावजी एक्सपायर हो गए हैं , समय लगेगा अभी।"
इस बात के बाद स्वाभिमान की भी शायद मौत आ गई थी। इस बात पर मुझे रोना नहीं आया। और शायद 3 दिन तक भी नहीं।
रास्ते में मैंने सबको टूटते देखा , उन्ही सबको जो उस आस शांति बनाए रखे थे , और अब वो शांति शांति ना रही , मगर मेरे लिए वो शांति और शांत हो गई।
पता नाही क्यूं , मुझे आज तक नही समझ आया कि मैं तब रो क्यों नहीं पाई?
रास्ता बहुत लंबा था , साथ में मेरे परिवाद वालो की आंसुओ का दौर भी।
घीलोठ पहुचकर जो चैन मिलता है हर बारी वो कही दिख ही नहीं रहा था। दूर दूर तक। अरावली इतनी शांतिपूर्वक चिल्ला रही थी जो कानों को चीर रही हो जैसे, मगर फिर भी कुछ सुनाई ना दे रहा हो।
20 मिनिट बाद मेरा गांव नजर आया , और दूर खड़ी वो गाड़ी जिसमे वो शव था जो कभी शरीर ही नहीं छोड़ना चाहता था , क्यूंकि उस शव की आकांक्षाएं बहुत दूर तक जाना चाहती थी । सुबह के 8:13 बजे थे तब , घर से दादी फोन घुमाएं जा रही की बावजी ठीक है या नही , क्यूंकि उनको खबर ही नहीं थी , अब कुछ ठीक नही है। मेरे घर के समीप जाने में डर लग रहा था । उन गलियों में डर था उस दिन।
मुझे आज भी डर लगता है उस डर को याद करके।
और आप कल्पला भी नहीं कर सकते मेरी ताकत की, कि मैं उस डर को शब्दों में उतार रही हुं अब।
मेरे परिवार में किसी को नहीं पता उनको कौन अंदर लेकर गया , मुझे सब याद है। वो सुध बुध खो चुके थे।
मेरे आंक से आंसू टपकना ही नहीं चाह रहा था क्यूंकि उसको समझ ही नही आ रहा था ये क्या हो रहा है। अंदर आकर देखा मेरे घर वाले , भाई बहन , पड़ोसी , बावजी के खास आदमी की क्या दशा थी।
और मैं उनको देखने में व्यस्त हो चुकी थी। या पता नही , अंदर से कौन कह रहा था कि देखो इन्हे , ये इक झटके से कैसे टूट गए हैं। पता नही मुझे भी।
मजे कुछ नहि सूझ रहा था। मेरी आंख में आंसू न था , एक भी , एक भी । शायद आना ही नही चाहता था , या शायद उसके आने का कोई अस्तित्व ही नहीं था , या शायद वो इस काबिल ही नही था ।
पता नहीं !
मेरा परिवार बिलख रहा था।
मुझे आज भी याद है मेरे हाथों में अचानक कम्पन होना शुरू हुआ। वो मेरे साथ पहली बार हुआ था ।
मेरे पैर मेरे काबू से परे हो चुके थे , उनमें बहुत गहरा कम्पन चढ़ चुका था । मगर मजाल आंसू की , जो आकर टपक भी जाए ।
मुझे याद है मैंने सबको चिल्ला चिल्ला कर बोला, मज़े डर लग रहा है , मुझे डर लग रहा है। मेरी बड़ी बहन खुद को नही रोक पा रही थी। छोटी बहनों की तरफ में दुख में वैसे भी नही देख सकती। परन्तु मुझे डर लग रहा था, पर किस बात से और किस बात का डर ?
मुझे आज तक जवाब नहीं मिला है पर मुझे डर लग रहा था। इतने रिश्तेदार , गांव गली के लोग आए , मैंने सबको देखा।
पर सबसे करीब मैंने एक चीज को देखा , जिसका जिक्र मैंने शुरूआत में करा था , मैंने मौत को करीब से देखा।
मैंने एक मौत के साथ , आस की मौत को देखा।
मैंने खुद की मौत को देखा , मैंने वह खड़े हर इंसान को मौत के ठीक उनके पीछे खड़े देखा जिनको वो नहीं देख पा रहे थे।
हर उस आंसू की मौत को देखा , जो किसी मौत का मातम मनाने आंखों का जीवन छोड़कर आता है।
क्यों आता है , बस बाहर आकर सूखने के लिए और हमेशा के लिए मौत में समरपन होने।
उस मौत को देखा जिसे मैंने हमेशा से नकारा था क्यूंकि मैंने उसको कभी स्वीकार नहीं करना चाहा।
नवीं कक्षा तक मैं सीधा बोलती थी मौत से किसे डर नहि लगता , परन्तु दिन मुझे डर लगा , और वो आखिरी बार था ।
मौत शब्द उस दिन मेरी ज़िंदगी में ऐसे जड़ा गया था कि मैं आज तक उसी लिखने से नहीं थकती।
शाम कैसे गुजरी नही पता , और मैं दोपहर का वर्णन नही कर पाऊंगी शायद वर्णन करते वक्त मुझे मौत दिख जाए। वो दोपहर मुझे खुद से कभी नहीं निकालेगी ।
और न ही मैं निकलने दूंगी।
उस रात मैंने मौत पर ही ढूंढना शुरू करा। शायद इस रात तो मैं भगवान में भी विश्वास कर लेती परन्तु वहां एक अजीब सी यमराज की कहानी लिखी थी , जो मुझे सही नहीं लगी। फिर मैंने मौत पर पढ़ना शुरू करा ।
जून 2021 में सद्गुरु की 'डेथ' खरीदी। पढ़ना शुरू की। प्रभावती हुई। और ये जाना अगर ये प्रभाव 20/12/2020 से पहले पड़ जाता तो मैं डर को नही महसूस कर पाती।
परन्तु मैं खुश हूं मौत ने बिना आए , ये सिखाया कि मैं बहुत पास हूं , बस मुझे महसूस करो इसी जीवन में।
हर उस छोड़ी हुई सांस में , क्यूंकि मौत कहती है मैं नहीं जानती ये छोड़ी हुई सांस अगले पल में शायद मुझे बुला बैठे।
मुझे तो लिखते समय भी डर था कही मौत ना आ जाए , और फिर ये जीवन क्या इतना समर्थ है कि ये इस लेख को पूरा कर दे !
आज मैं 18 साल की हुं , और मेरा जीवन और मेरी मौत भी 18 ही साल के हैं , क्यूंकि ये भी उसी दौरान गर्भ में पल रहे थे, इन्हे भी नही पता था , जब मौत आ जाए।
मौत में अलग प्रकार का जीवन है , जो आप जब समझ सकेंगे जब मौत को समझेंगे। मौत के जीवनकाल को समझेंगे।
जीवन कितना सरल और सहज है , इसे अपनी सीमाएं ज्ञात है , परन्तु मौत को नहीं। मौत का पहला चरण तो तय है , इतना तो शायद जीवन का भी नही है । परन्तु मौत को खुद ही नही पता आखिर चरण कहा जाकर सीमा समाप्त करेगा ।
इसलिए मौत खुद में ही ज्यादा मायने रखती है।
मौत अब मेरे लिए वाकई एक खेल बन चुकी है जिसे मैं हर बार अलग ढंग से देखने की कोशिश करती हु , और मौत भी पीछे से हस्ती हुई नजर आती है।
उसको पता नहीं हैं शायद कब आना है , परन्तु उसको पन्नों पर उतरना है , इसलिए इंतजार करती है अपने समय का। ठीक समय का।
अगर पढ़ने में मजा नहीं आया हो तो मैं कुछ नहीं कर सकती , बस पीछे अपनी मौत को देखना । और मुस्कुरा देना , वो वापस मुस्कुरा देगी, देखना!
वो किसी स्वाभिमान से ही मौत है ।
~चेतना 🌻
💎🤌❤️
ReplyDeleteWell written
ReplyDeleteSpeechless!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
ReplyDeleteIt can be felt only !!!!!!!
Heart touching words ❤️❤️I feel it I have no word🌼 do explain my feelings ❤️
ReplyDeleteHeart touching words ❤️
ReplyDeleteSuccess penwoman
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