उधारी इश्क़

आखिर घंटी बजाते मेरी गली में आया,
मेरी सोती नींद को जान बूझकर जगाया। 

सौगात में एक नहीं हजार जायके लाया,
मेरा दिल पत्थर थोड़ी है, जो उसपर ना आया।

आधी नींद में होशो हवास बड़ी दूर भगाया,
नए जायके के लिए पुराना सुध ऐसे गवाया।

खिड़की से झांका तो एक चेहरा नजर आया,
दिखने में नया, पर एहसास पुराना ही जैसे छाया।

दिल फिर भी माना, सौदा करने को मन ललचाया,
खाली तिजोरी कुछ ना बोली , उसने भी हाथ हिलाया।

चलो आज फिर दिमाग ने अपना मुंह टिकड़ाया,
थोड़ी संख्या का बेकार सा शतरंज चौड़ में दौड़ाया।

पर रुको जरा, उधार का ख्याल दिमाग में आया,
क्यूंकि दिल पूरे जोश से तो जश्न मनाने आया।

पुराने कर्जों का वहम मिटाने दिल थोड़ा उकसाया,
दिमाग ने मारा चांटा, फिर होश ठिकाने आया।

उधारी इश्क़ करने से कितनो ने कर्ज बढ़ाया,
चुका कुछ पाया नही, कसूर दिलो दिमाग पर आया। 

वेतन का इंतजार मुझे, सौदा समझ तब ही आया,
उधारी इश्क़ ने तो हर बार दुनिया को खूब सताया।।

~चेतना 🌻

 

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